कहते हैं जो वक़्त की क़द्र नहीं करता, वक़्त उसकी क़द्र नहीं करता।
और सही भी है। आखिर जीवन को सार्थकता देने का एकमात्र साधन वक़्त ही है।
प्रस्तुत कविता उन्ही लम्हों के लिए है जब हम वक़्त रहते वक़्त का सम्मान नहीं करते।
संजोग मानू या हकीकत
सरकता सा लगता है जो वक़्त
फिसल रहा कुछ तेजी से
अब फांसले जो बढ़ चले हैं
महसूस किया है
कि करीब आ रहा हूँ
समझी न कभी जिसकी कीमत
उसका मोहताज हो चला हूँ
सब्र के दावे सदा करता रहा
मंजिल को सदा तकता रहा
बंधा रहा सदा पाशों में
जब दोषी था खुद मैं
दोष फिर भी जग पर मँढ़ता रहा
आवाज तो सदा देता था मैं
पर स्वर उसे कभी दिए ना
खोखला बना दिया दावों को
खुद को ही दगा दे दे कर
अब खिदमत करूँ भी तो किसकी!!!
जब संजोग हकिहत को समझता रहा
में तो मस्त रहा
और वक़्त अपनी चाल चलता रहा
और वक़्त अपनी चाल चलता रहा
