Dec 24, 2010

"आँधी में खोता बचपन"

आज ही का किस्सा है ये, जिसे मैं आपके समक्ष कविता के रूप में प्रसतुत कर रही हूँ। कोई नई बात नहीं है, हम सभी रोज देखते हैं उन बच्चों को जो कल के सवेरे से तो वाकिफ हैं लेकिन उसमे समाहित उस काली धुँध से वाकिफ नहीं जो उनका बचपन ही लील रही है। और हमारी संवेदनहीनता की पराकाष्ठा भी ओर क्या होगी जो हम सबकुछ देखकर भी अंजान बने हुए हैं।

न जाने कैसी आँधी में,
बचपन को खोते देखा।
जिस फूल से महकता था चमन,
उसी फूल को मुरझाते देखा॥

जिसकी किलकारी बाँधती थी समाँ,
आज उसी फूल को खुद से वंचित देखा।
देखा मैंने दिन को काला,
आजादी भरे वातावरण में आजादी को रोते देखा॥
"जाने ये कैसा बचपन देखा!!"

Dec 18, 2010

"स्वर्ण स्वप्न"

इक नन्हे से बच्चे का कोमल सा मन बड़े ही सपने बुनता है…। मगर जब वो धीरे धीरे बड़ा होता है, और असली दुनिया में कदम रखता है तो किस तरह उसके सपने धीरे धीरे टूटते हैं उन्ही भावनाओं को व्यक्त करने का प्रयास करती है ये कवीता…                   ।


उलझा हुआ धागा कोई,
पांव आज अटक गया।
स्वर्ण स्वप्न से जगा कोई,
धरातल पटक गया॥

कदम तो बढा आशा का था, जाने कैसे हुआ
निराशा के भंवर में भटक गया।
कोशिश थी लक्ष्य को पा लेने की,
हार का झोंका अलग कहीं झिटक गया॥
स्वर्ण स्वप्न से जगा कोई…

रोशनी ही रोशनी तांकता था हर जगह,
देख वो दुनियावी खोखले दिखावे को,
अँधेरे कोने मे जा कहीं सिमट गया।
चल पड़ा था अपना मान कर जिन्हें,
परछाईयों का धुंध पा आत्म उसका सिसक गया॥
स्वर्ण स्वप्न से जगा कोई…

विश्वास से भरकर चला था जो,
आखिर अंधविश्वास से कैसे लिपट गया?
कोई देखकर ही सँवार लो ,
वक्त का झोंका आज उसे कहीं निपट गया॥
स्वर्ण स्वप्न से जगा कोई,
धरातल पटक गया



                   

Dec 15, 2010

सही राह !!!

जीवन की राहों को जिस प्रेरणा की अकसर जरुरत होती है, उसी प्रेरणा को कुछ पंक्तियों के माध्यम से मैने व्यक्त करने की छोटी सी कोशिश की है, उम्मीद करती हूँ ये पंक्तियाँ आपकी आशा पर खरी उतरेंगी !!!  धन्यवाद्।                          



दिन की काली रोशनी चलना करती हो मुश्किल
तो रातों में चाँद की छाँव मे चलना तुम
हो जाए कंकड़ को सह पाना मुश्किल
तो पगडंडी की राह पकड़ना तुम 


है जीवन ये कठिन राह एक
कुछ अमृत भी संग ले लेना तुम
ना सोचो मन्जिल एक राहत ही है
कुछ सह्ने की हिम्मत, अन्त के लिए भी रखना तुम


हो राहो में अपनों की आँखों में भी बेगानापन
हार तब भी ना मानना, चाहें आँखें बंद कर लेना तुम
आखिर हिम्मत भी एक नया सवेरा है
उसकी किरणों को भी साथ ले लेना तुम

धीरे चलना, मद्दम चलना
मगर सही राह पकड़ना तुम… 
मगर सही राह पकड़ना तुम!!!

Dec 11, 2010

"ना पूछो तुम…"

ये जीवन एक बड़ी ही अदभुत  परिस्तिथी है, जिसमेँ हम ना जाने कितनी बार ही कशमकश में स्वयम को उलझा पाते हैँ!!!
ये कविता कुछ उन्हीं लमहोँ के लिए है, जब  खाली समय मे हम स्वयम को वक्त के तराजू मे तोलते हैँ…


ना पूछो तुम, ये किन बातोँ का परिणाम रहा
कौन आगे निकल गया, कौन पीछे खड़ा रहा

जाने कितनी मुशकिल से
थी ईमानोँ की नीव रखी
और ना जाने कैसे फ़िर भी
थी उसने परिवर्तन की राह चखी
आखिर वो, सदियोँ का धोखा सह आया
पर जीवन राह अडग रहा
ना पूछो तुम, ये किन बातोँ का परिणाम रहा

तुम क्या जानो, क्या समझो तुम,
कितने अरमानो को साथ लिए
है जरुरत का अम्बार मचल रहा
परिवर्तन से साथ तुम्हारा
आखिर उसको क्योँ है खटक रहा
ना पूछो तुम, ये किन बातोँ का परिणाम रहा

तुम भूले हो याद नहीँ
कभी था कुछ अरमानोँ के नीचे दब गया
माहौल ऐसा दिया था तुमने, है जीवित वो मरा नहीँ
हाँ घुटन से बस वो तड़प गया

अब तो कुछ समझो अब तो कुछ जानो ,
इक आशा के सहारे था क्यों वो खड़ा रहा
ना पूछो तुम, ये किन बातो का परिणाम रहा
कौन आगे निकल गया, कौन पीछे खड़ा रहा

Dec 9, 2010

"कौन हूँ मैं…"

शुरुआत की कुछ कविताओं में  से ये वह कविता है जो मेरे बहुत करीब है,
जीवन की राहों  मे चलते चलते जब हम चलने की ही वजह भूल जाते हैं  तो मन की जो स्तिथि होती है,
ये पन्क्तियाँ उसी स्तिथि का वर्णन करने की कोशिश करती हैं ………




कौन हूँ मैं, ये हर पल सोचता हूँ मैं,
कहा से आया हूँ, हर पल अपना अस्तित्व खोजता हूँ मैं॥
अपने इन सवालो का जवाब हर जगह ढूढ्ता हूँ मैं,
  धरती हो या आसमान, सभी से तो ये पूँछ्ता हूँ मैं॥


क्या छुपा है
जीवन जीने के पीछे
क्या सच में खुदा है
आसमाँ के ऊपर या नीचे

कैसे सुख-दुख चक्र
चलता जाता है
समय निकल जाता है
व्यक्ति खड़ा रह जाता है

कैसे धरती से चक्कर कट्वाता है
सूरज उगलते हुए आग
क्यो चाँद पर हैं दाग
कैसे चिराग जला देते थे
तानसेन के राग

धरती पर अपनो का होना है
कितना प्यारा एह्सास,
क्यो मानव मे हैं
सबसे ज्यादा जज्बात

काश इन सवालों का
मेरे पास जवाब होता
इस धरती पर क्यों है
कुछ तो एह्सास होता

अगले पल क्या हो जाये
कोई खयाल नहीं,
सच है जग की रचना करने वाले
तेरा भी जवाब नहीं

लगता है, अन्त हो जाएगा
माटी से माटी का मिलन हो जाएगा
हम जीवन भर धरती पर आने का तात्पर्य खोजते रहेँगे
और तात्पर्य ही खत्म हो जाएगा!!

Dec 6, 2010

भूल ना जाना!

सब कु्छ पाने की कोशिश में, कहीं मुस्कुराना भी ना भूल जाना
सब कुछ हासिल करने की राह में,  तुम अपनों को ही ना खो जाना।
तुम चलना ना उस राह पर, जहाँ तुम सफ़ल तो हो जाओ
मगर मुड़ कर जब देखो उस राह में, तो चलने की वजह ही ना भुल जाना॥

पह्चान

निराशा के सागर से उबरने के लिए,
आशा की किरण के साथ नन्हीं सी उम्मीद ही काफ़ी है।
स्वयम को पह्चानने के लिए,
शीशा नहीं सही नजर ही काफी है॥