Jun 30, 2016

चलो देखें......

बचपन में गर्मी की छुट्टियों में गांव जाया करते थे और घर से रोटी बनवा कर खेतों पर ही ले जाया करते थे. वहाँ दादा के साथ पेड़ों के नीचे बैठ कर खाने में कितना ही अच्छा लगता था. शायद ये प्रकृति की महानता ही है जिसे हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं, पर प्रकृति नहीं भूलती हमारे प्रति अपने कर्तव्यों को.  प्रकृति की  नियमित दिनचर्या में ऐसे अनेक कार्य हैं जिनसे हम कितना कुछ सीख सकते हैं और जीवन को सार्थकता की और अग्रसर कर सकते हैं.  प्रस्तुत कविता इसी दिशा में एक छोटा सा प्रयास है.



चलो देखें
सूरज का उगना
प्रकृति का जागना
चिड़ियों का चहकना
और फिर बहना हवा का
झूमना खेतों का
भिगोना बूँदों का
महकना मिट्टी का
अंकुरित होना बीज का
सरकना पत्तों का
चमकना तारों का

पहाड़ों की उँचाई
समुद्र की गहराई
मस्ती झरनों की
समुद्र से मिलने निकली नदी
चट्टाने वो बर्फ से लदी
ब्रह्मांड की विशालता
जल की निश्छलता
किरणों की तीव्रता
चंद्रिका की शीतलता

चलो देखें जो सच है
सृष्टि का वो कवच है
जिससे रोशन हैं हम
जिसके कृतज्ञ हैं हम

जो हमें सीखा दे
वो जो न आया अब तक
देने का स्वाद
पाने का एहसास
स्वच्छंदता की मिठास
मुक्त परिहास

पवित्रता की संगत 
संगठन की शक्ति
शक्ति की तृप्ति
तृप्ति से पूर्णता
पूर्णता की सोच
सोच का लक्ष्य
जीवन का तथ्य
तथ्य की सार्थकता
सार्थकता का अानंद

चलो देखें
की अब न रुका जाएगा
अखिर कब तक सत्य से बचा जाएगा
अखिर कब तक सत्य से बचा जाएगा

May 11, 2016

लक्ष्य

बाल्यवस्था से ही हमें लक्ष्य के प्रति सचेत करना शुरू कर दिया जाता है. अकसर हम बच्चों से पूछते हैं कि बड़े होकर तुम क्या बनना चाहते हो. इसमें कोई दूसरी राय नहीं की यह सही भी है. अर्थात समस्या लक्ष्य का बोध कराने में नहीं, अपितु सही लक्ष्य के चयन में है. अंत में काश शब्द अगर न लगे तो जीवन सच में  अद्भुत  अनुभव हो सकता है.  प्रस्तुत कविता का लक्ष्य यही बताना है कि कोई भी मनुष्य कम नहीं बस हर किसी के कार्य क्षेत्र अलग हैं इसलिए अलग हैं उनकी क्षमताएं। 




Jan 17, 2016

वक़्त

कहते हैं जो वक़्त की क़द्र नहीं करता, वक़्त उसकी क़द्र नहीं करता।  
और सही भी है।  आखिर जीवन को सार्थकता देने का एकमात्र साधन वक़्त ही है।  
प्रस्तुत कविता उन्ही लम्हों के लिए है जब हम वक़्त रहते वक़्त का सम्मान नहीं करते। 




संजोग मानू या हकीकत 
सरकता  सा लगता है जो वक़्त 
फिसल रहा कुछ तेजी से 

अब फांसले जो बढ़ चले हैं 
महसूस किया है 
कि करीब आ रहा हूँ 
समझी न कभी जिसकी कीमत 
उसका मोहताज हो चला हूँ 

सब्र के दावे सदा करता रहा 
मंजिल को सदा तकता रहा 
बंधा रहा सदा पाशों में 
जब दोषी था खुद मैं 
दोष फिर भी जग पर मँढ़ता रहा 

आवाज तो सदा देता था मैं 
पर स्वर उसे कभी दिए ना 
खोखला बना दिया दावों को
खुद को ही दगा दे दे कर 

अब खिदमत करूँ भी तो किसकी!!!
जब संजोग हकिहत को समझता रहा 
में तो मस्त रहा 
और वक़्त अपनी चाल चलता रहा 
और वक़्त अपनी चाल चलता रहा