बचपन में गर्मी की छुट्टियों में गांव जाया करते थे और घर से रोटी बनवा कर खेतों पर ही ले जाया करते थे. वहाँ दादा के साथ पेड़ों के नीचे बैठ कर खाने में कितना ही अच्छा लगता था. शायद ये प्रकृति की महानता ही है जिसे हम अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं, पर प्रकृति नहीं भूलती हमारे प्रति अपने कर्तव्यों को. प्रकृति की नियमित दिनचर्या में ऐसे अनेक कार्य हैं जिनसे हम कितना कुछ सीख सकते हैं और जीवन को सार्थकता की और अग्रसर कर सकते हैं. प्रस्तुत कविता इसी दिशा में एक छोटा सा प्रयास है.
चलो देखें
सूरज का उगना
प्रकृति का जागना
चिड़ियों का चहकना
और फिर बहना हवा का
झूमना खेतों का
भिगोना बूँदों का
महकना मिट्टी का
अंकुरित होना बीज का
सरकना पत्तों का
चमकना तारों का
पहाड़ों की उँचाई
समुद्र की गहराई
मस्ती झरनों की
समुद्र से मिलने निकली नदी
चट्टाने वो बर्फ से लदी
ब्रह्मांड की विशालता
जल की निश्छलता
किरणों की तीव्रता
चंद्रिका की शीतलता
चलो देखें जो सच है
सृष्टि का वो कवच है
जिससे रोशन हैं हम
जिसके कृतज्ञ हैं हम
जो हमें सीखा दे
वो जो न आया अब तक
देने का स्वाद
पाने का एहसास
स्वच्छंदता की मिठास
मुक्त परिहास
पवित्रता की संगत
संगठन की शक्ति
शक्ति की तृप्ति
तृप्ति से पूर्णता
पूर्णता की सोच
सोच का लक्ष्य
जीवन का तथ्य
तथ्य की सार्थकता
सार्थकता का अानंद
चलो देखें
की अब न रुका जाएगा
अखिर कब तक सत्य से बचा जाएगा
अखिर कब तक सत्य से बचा जाएगा

2 comments:
beautiful lines...... :) :) :)
very nice..... :-)
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