न जाने कैसी आँधी में,
बचपन को खोते देखा।
जिस फूल से महकता था चमन,
उसी फूल को मुरझाते देखा॥
जिसकी किलकारी बाँधती थी समाँ,
आज उसी फूल को खुद से वंचित देखा।
देखा मैंने दिन को काला,
आजादी भरे वातावरण में आजादी को रोते देखा॥
जब भावनाओं एवम संवेदनाओं का बहाव मन के बहाव से तेज हो जाता है, तब पन्ने पर उकेरी पन्क्तियाँ ही मन के उन भावों को प्रकाशित कर पाती हैं… बस अपनी उन्हीं भावनाओं को सार्थकता देने कि एक छोटी सी चेष्ठा है ये ब्लॉग. आप सभी का इस ब्लॉग पर आने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद!!!