Dec 24, 2010

"आँधी में खोता बचपन"

आज ही का किस्सा है ये, जिसे मैं आपके समक्ष कविता के रूप में प्रसतुत कर रही हूँ। कोई नई बात नहीं है, हम सभी रोज देखते हैं उन बच्चों को जो कल के सवेरे से तो वाकिफ हैं लेकिन उसमे समाहित उस काली धुँध से वाकिफ नहीं जो उनका बचपन ही लील रही है। और हमारी संवेदनहीनता की पराकाष्ठा भी ओर क्या होगी जो हम सबकुछ देखकर भी अंजान बने हुए हैं।

न जाने कैसी आँधी में,
बचपन को खोते देखा।
जिस फूल से महकता था चमन,
उसी फूल को मुरझाते देखा॥

जिसकी किलकारी बाँधती थी समाँ,
आज उसी फूल को खुद से वंचित देखा।
देखा मैंने दिन को काला,
आजादी भरे वातावरण में आजादी को रोते देखा॥
"जाने ये कैसा बचपन देखा!!"

5 comments:

Samarth said...

दुख की बात है लेकिन सच है ...

D Black Factor said...

Very nice Aditi..Vineet Yadav

Aditi Chaudhary said...

समर्थ: हाँ सच तो है, लेकिन दुखी तो यह बात करती है कि हम इसे देखकर भी अनजान बने हुए हैं॥

Aditi Chaudhary said...

विनीत सर: आपका बहुत बहुत धन्यवाद सर॥

Anupam said...

Good Job.....the picture makes it complete...