जीवन की राहों मे चलते चलते जब हम चलने की ही वजह भूल जाते हैं तो मन की जो स्तिथि होती है,
ये पन्क्तियाँ उसी स्तिथि का वर्णन करने की कोशिश करती हैं ………
कौन हूँ मैं, ये हर पल सोचता हूँ मैं,
कहा से आया हूँ, हर पल अपना अस्तित्व खोजता हूँ मैं॥
अपने इन सवालो का जवाब हर जगह ढूढ्ता हूँ मैं,
धरती हो या आसमान, सभी से तो ये पूँछ्ता हूँ मैं॥
क्या छुपा है
जीवन जीने के पीछे
क्या सच में खुदा है
आसमाँ के ऊपर या नीचे
कैसे सुख-दुख चक्र
चलता जाता है
समय निकल जाता है
व्यक्ति खड़ा रह जाता है
कैसे धरती से चक्कर कट्वाता है
सूरज उगलते हुए आग
क्यो चाँद पर हैं दाग
कैसे चिराग जला देते थे
तानसेन के राग
धरती पर अपनो का होना है
कितना प्यारा एह्सास,
क्यो मानव मे हैं
सबसे ज्यादा जज्बात
काश इन सवालों का
मेरे पास जवाब होता
इस धरती पर क्यों है
कुछ तो एह्सास होता
अगले पल क्या हो जाये
कोई खयाल नहीं,
सच है जग की रचना करने वाले
तेरा भी जवाब नहीं
लगता है, अन्त हो जाएगा
माटी से माटी का मिलन हो जाएगा
हम जीवन भर धरती पर आने का तात्पर्य खोजते रहेँगे
और तात्पर्य ही खत्म हो जाएगा!!

4 comments:
hey gud moto....
m happy 4 ur blog as i knw dis z sumthing of ur intrst n givs u happiness....
waise nice creation....
n luking forward 2 c sum more creations...
यह कविता तो मुझे सबसे ज्यादा पसंद है ..और सबसे ज्यादा इसकी अंतिम पंक्तियाँ
"लगता है, अन्त हो जाएगा,
माटी से माटी का मिलन हो जाएगा।
हम जीवन भर धरती पर आने का तात्पर्य खोजते रहेँगे,
और तात्पर्य ही खत्म हो जाएगा॥"
इतने कम एवम सरल शब्दों में तुमने हर व्यक्ति के दिमाग में चलने वाली उधेड़बुन को व्यक्त कर दिया है..तुम्हारी सभी कविताओं में से सबसे उतकृष्ट एवम अंतरमन को जागृत कर देने वाली रचना है ये..!!
दिव्या: साथ देने के लिए धन्यवाद्…
अंकिता दी:आपका बहुत बहुत हार्दिक धन्यवाद्…
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